चम्बल के बीहड़ का नाम सामने आते ही आंखों के सामने घूम जाती है लंबी मूंछों और घनी दाढ़ी वाले डकैतों की तस्वीर। क्या यही है चम्बल का सच? शायद नहीं। भले ही चम्बल की माटी ने बागियों (डकैतों) को आश्रय दिया हो, लेकिन उसने ग्वालियर-चम्बल अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अपने आँचल से लगाए रखा। और माटी में ऐसी तासीर जगाई कि चम्बलराइट्स को सच कहने व सुनने की हिम्मत मिल सके। यदि सच से है आपका भी वास्ता, तो चम्बल के बीहड़ में स्वागत है आपका...।
Saturday, October 2, 2010
लो आ गए अमन पर दाग लगाने वाले
मुल्ला मुलायम को अपने वोट बैंक की चिंता है, इसलिए उन्होंने अयोध्या पर आए फैसले को एक ही झटके में मुस्लिम समुदाय के साथ ठगी करार दे दिया। यह कहने से भी नहीं चूके कि फैसले में आस्था को कानून व साक्ष्यों से ऊपर रखा गया है। अंगुलियों पर गिने जाने लायक कुछ फिरकापरस्त लोगों ने भी उनके सुर में सुर मिलाया है। सुलह और सदभाव के राह में कांटे बोने का काम करने वाले इन लोगों को लगता है देश का अमन रास नहीं आ रहा। आस्था का आधार ही विश्वास है। आस्था और विश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता। बरसों-बरस की तपस्या इसके पीछे होती है। यदि रामलला हिन्दुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या है। तीस सितम्बर को फैसले के दिन करोड़ों भारतीयों ने जिस संयम और सदभावना का परिचय दिया है, उससे पूरी दुनिया आश्चर्यचकित है। आस्था पर सवाल उठाने वाले यह लोग भलीभांति जानते हैं कि समाज में उनकी पहचान भी एक विश्वास पर ही टिकी है। माँ ने बता दिया कि फलां तुम्हारा पिता है, तो आपने मान लिया और पिता का नाम स्वीकार भी कर लिया। जो लोग रामलला की आस्था और विश्वास पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, हो सकता है यही लोग कल अपनी माँ से भी अपने पिता की असली पहचान पूछ सकते हैं। कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब भी किसी आस्था का ही परिणाम है। यदि रामलला नहीं है, तो कुरान, गुरुग्रंथ साहिब और बाइबिल भी नहीं है। नेक सलाह यही है कि न्यायपालिका को अपना काम करने दें और अमन की राह को बेवजह की जुगाली से गंदा न करें।
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2 comments:
इन्हें तो यह करना ही था...
जो लोग रामलला की आस्था और विश्वास पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, हो सकता है यही लोग कल अपनी माँ से भी अपने पिता की असली पहचान पूछ सकते हैं।
poore lekh ka saar yahi hai
sabse behtreen line hain yeh
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