Monday, January 3, 2011

सचमुच, पापा पास हो गए


पहाड़ी वादियों की सुंदरता का जादू सिर चढ़कर बोलता है। बच्चों की जिद थी कि इस बार नया साल पहाड़ी वादियों में ही सेलीब्रेट किया जाए। जिद के आगे अपनेराम भी झुक गए। दिल्ली में रहने वाले बचपन के मित्र को तैयार किया और पूरे परिवार के साथ रवाना हो गए पहाड़ी वादियों की ओर। हल्द्वानी से तल्लारामगढ़, नथुआखानद्वारा और फिर वहां से हरतोला। जितना रोमांच पहाड़ी ड्राइव में आया, उससे कहीं अधिक दिल खुश हुआ हरतोला के कॉटेज में। दूर-दूर तक आबादी का नाम-ओ-निशां नहीं। जिस ओर भी नजर दौड़ाओ, बर्फ से लकदक हिमालय के गगनचुंबी पहाड़ ही नजर आते। बच्चे जल्द ही आपस में हिल-मिल गए और देसी-विदेशी खेलों की दुनियां में खो गए। ड्राइव की लंबी थकान के चलते पहली रात कैसे कट गई, पता ही नहीं चला। रात को ही बरसात का सिलसिला शुरु हो गया। सुबह छह बजे बर्फवारी ने दस्तक दे दी। लगातार एक ही गति से बर्फ का गिरना जारी रहा। लगभग चार घंटे में आधा फीट तक बर्फ जमा हो चुकी थी। कॉटेज से जिस ओर भी नजर गई बर्फ की चादर ही नजर आई। सबने जमकर बर्फवारी का आनंद लिया। बच्चों के साथ बड़े भी बच्चे हो गए। बर्फवारी की गति देखकर अंदाज लगाना मुश्किल था कि यह कब थमेगी। कॉटेज के केयरटेकर और उसके साथियों की चिंता भी बर्फवारी के साथ बढ़ती जा रही थी। उनका अंदाज था कि ऐसे ही बर्फवारी होती रही तो देर रात तक दो फीट बर्फ जम सकती है। ऐसे में पहाड़ की जिंदगी ठहर जाएगी और सड़कों पर वाहनों का आवागमन नहीं हो सकेगा।

बर्फवारी का आनंद उठा चुके थे। अब वहां से निकलने की चिंता थी। तत्काल निर्णय लिया और दोनों मित्रों ने अपने वाहन लेकर निकल पड़े। ऊबड़खाबड़ पहाड़ी रास्ता और उस पर बर्फ की चादर। हल्के से ब्रेक लगाने पर गाड़ी के बहककर खाई में जाने का डर। गाड़िया १०-१५ की स्पीड से रेंगती रहीं। तल्ला रामगढ़ तक का सफर ऐसे ही चला, मगर रामगढ आते-आते बर्फवारी के साथ-साथ कोहरे व ओले ने भी अपनेराम और उनके मित्र की जमकर परीक्षा ली। विपरीत हालात में रात के अंधियारे में पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी ड्राइव करना हर पल खतरे को बुलाने जैसा था, फिर भी हम हिम्मत और साहस के साथ भीमताल तक सुरक्षित पहुंच गए। कड़कड़ाती सर्दी में माथे से टपकता पसीना अपनेराम की घबराहट बयां कर रहा था, इसी बीच बच्चे के मुंह से बरबस ही निकला-पापा आप पास हो गए। यह कमेंट सुनकर कोई भी हंसी नहीं रोक पाया।

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